चंदू चैंपियन फ़िल्म रिव्यू मे हम फिल्म के हर एक जोन मे बारे मे बताएंगे। की क्यों फिल्म इतनी स्पेशल है, अगर आप भी जिंदगी मे कुछ बड़ा करना चाहते है तो जरुर ये रिव्यू पढे और फिल्म देखे। आप भी खुद से पूछ बैठेगे की “How’s the Josh? आपके दिल से निकलेगा High Sir”.

चंदू चैंपियन फ़िल्म का ये रिव्यू पढ़कर आप भी भर जायेंगे Full on जोश से
चंदू चैंपियन फ़िल्म रिव्यू: पिछले हफ्ते रिलीस कार्तिक आर्यन स्टाररर फ़िल्म चंदू चैंपियन रिलीज हुई हैं। फ़िल्म एक स्पोर्ट्स बायोपिक है। कार्तिक ने भारत को पैरा ओलंपिक्स में मेडल दिलवाने वाले मुर्लिकांत राजाराम पेटकर के संघर्षमय जीवन पर बनी है। मुर्लिकांत राजाराम पेटकर ने 1972 के पैरा ओलिम्पिक में भारत के लिये तैराकी में 50 मीटर( फ्रीस्टाइल) में प्रथम स्वर्ण पदक जीता था। चंदू चेम्पियन के निर्माता है साजिद नाडियाडवाला। फ़िल्म का निर्देशन। बजरंगी भाई जान, काबुल एक्सप्रेस और ट्यूब लाइट जैसी फिल्में बनाने वाले कबीर खान। बायोपिक पर बनी चंदू चैम्पियन का क्लाइमेक्स आसानी से बताया जा सकता है पर फ़िल्म में दिखाए एक विकलांग स्पोर्ट्स मैन के जीवन में आई कठिनाइयों में कैसे संभलकर उनका सामना कर जीतता है। यही उत्सुकता पब्लिक को अपनी सीट से उठने नहीं देगी।
चंदू चैंपियन की ये है असली कहानी
चंदू चैंपियन फ़िल्म रिव्यू मे बात शुरू करते है 70 साल के बूढ़े हो चुके चंदू से है। चंदू पुलिस स्टेशन में बैठ देश के राष्ट्रपति पर केस करना चाहता है जो की असंभव है। तब चंदू अपने संघर्ष की कहानी बताना शुरू करता है। ज़िंदगी के अलग-अलग को सुनाने के लिये फ़िल्म कई दफा फ्लैश बैक में जाती है। छोटा चंदू अपने समय के पहलवान खशाबा दादासाहब जाधव को कुश्ती में मिले पहले ओलिम्पिक मेडल को देख कर ओलिम्पिक में मेडल जीतने का सपना देखता है। उसके स्कूल के सहपाठी उसका मजाक उड़ाते हैं। जब मुरली बड़ा होता है तो गांव के ही एक पहलवान को अपना गुरु बना लेता है। गुरु उसे कुश्ती के दांव पेंच नहीं सिखाता। एक दिन कुश्ती प्रतियोगिता में पहलवान मुरली को उसके प्रतिद्वंद्वी को जिताने के लिये कहता है। लेकिन मुर्लिकांत उसे उठाके पटक देता है जिससे मुरली जीत जाता है। उसकी जीत गांववालों को अच्छी नहीं लगती तो वह भागकर ट्रेन पकड़ लेता है। उसी ट्रेन मे उसे एक सच्चा दोस्त मिलता है। वह दोस्त उसे आर्मी द्वारा ओलिम्पिक तक पहुँचने की बात सुझाता है।कश्मीर में 1965 की जंग में लड़ते हुए चंदू को 9 गोलियां लगती है। वह कोमा में चला जाता है। दर्शकों को यह सीन नर्वस कर सकता है। कुछ दिन बाद मुर्लिकान्त कोमा से लौट आता है। उसे यकीन नहीं होता उसका शरीर अब पहले जैसा नहीं रहा – विकलांग हो गया है। यहीं से वह अपने साहस का पुनः परिचय करवाकर हार नहीं मानता और आखिर ओलयम्पियन बनने की तैयारी करता है। फ़िल्म को बच्चों को अवश्य दिखाना चाहिये जिससे उनका मनोबल बढ़ेगा और जीवन में अपने लक्ष्य की ओर नजर रहेगी।
कार्तिक आर्यन का अब तक का बेहतरीन अभिनय
कार्तिक ने मुर्लिकांत राजाराम पेटकर के किरदार में जान फूँक दी है। एक साधारण व्यक्ति से पहलवान फिर सिपाही और फिर ओलिंपियन के किरदार में कार्तिक ने अपने आपको बखूबी ढाला है। अन्य किरदारों में विजय राज़ मुरली के कोच के रूप में अभिनय कर रहे है। जाने माने अभिनेता यशपाल शर्मा सीनियर आर्मी ऑफिसर का रोल निभा रहे है। कॉमेडियन अभिनेता राजपाल यादव भी छोटा रोल करते दिखाई देते हैं। फ़िल्म में अभिनेत्री सोनाली कुलकर्णी भी पत्रकार के रोल में गेस्ट अपीयरेंस में दिखती है। इन सारे अभिनेताओं की खास बात यह है को इनसे निर्देशक को अधिक मेहनत नहीं करवानी पड़ती है। यह नेचुरल एक्टर्स है। हालांकि फिल्म केवल कार्तिक आर्यन के कंधों पर बनी है क्योंकि केवल वे ही चंदू चेम्पियन की जान है। स्पोर्ट्स बायोपिक में इससे पूर्व, एम एस धोनी, मेरी कॉम, अज़हर इत्यादी फिल्में बनी है जो कि हिट साबित हुई किंतु चंदू चेम्पियन पर ओलयम्पियन के जीवन पर बनी है। पैरा ओलयम्पियन्स को भारत में उतना नाम नहीं मिलता फिर उन पर बनी फिल्म से अधिक आशा नहीं रखी जा सकती। इसीलिये कयास यह लगाए का रहे हैं कि फ़िल्म अपना मूल बजट भी न निकाल पाये। फ़िल्म एडिटिंग की गलती की वजह से थोड़ा ज्यादा लम्बी हो गयी है। वहीं फ़िल्म में संगीत प्रीतम का दिया हुआ है।
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चंदू चैंपियन फ़िल्म रिव्यू पढ़कर आपके अंदर का जोश भी उबाल मार कर निकलेगा Guaranteed है।
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Vikram Singh
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